एक दिन जब हमारे कुछ दोस्तों में कही विदेश जाने की चर्चा होने लगी थी तब सब अपनी अपनी पसंद की बाहर की जगहों के नाम गिनाने लगे । फिर ज्यादातर दोस्तों ने एक शहर के बारे में बोला जो था मैड्रिड ( madrid)। फिर सब दोस्तों ने यह तय किया कि अगले दिन इसके बारे में खूब सारी जानकारियां एकत्र की जाएगी । इसके बाद सब दोस्तों ने मेरे इस शहर के बारे में काफ़ी अच्छी-खासी जानकारी एकत्र की जो इस प्रकार है :- मैड्रिड (madrid) स्पेन की राजधानी और सबसे अधिक आबादी वाला शहर है। मैड्रिड (madrid), देश और मैड्रिड (madrid)क्षेत्र के समुदाय दोनों के केंद्र में मंझनारेस (Manzanares) नदी पर स्थित है, स्पेन (spain) की राजधानी के रूप में, सरकार की सीट, स्पेनिश सम्राट का निवास, मैड्रिड देश का राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र भी है। यह समुद्र के स्तर से कुछ 2,120 फीट (646 मीटर) की ऊँचाई पर मेसेटा (स्पेनिश शब्द मेसा, "टेबल") से प्राप्त रेत और मिट्टी के एक अविच्छिन्न पठार पर स्थित है, जो इसे उच्चतम राजधानियों में से एक बनाता है। सिएरा डी गुआडरमा (Sierra de Guadarrama) की निकटता के साथ यह स्थान, ...
ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही पाप, पुण्य, नीति, अनीति, सदाचार, दुराचार आदि चीज़ो के बारे में ज्ञान दिया जाने लगा। फिर बचपन से ही ये सब सुनने से मन मे एक बात तो आ गयी कि अगर गलत करेंगे तो सजा तो जरूर मिलेगी चाहे वो किसी रूप मे हो।
मेरी उम्र उस समय बारह साल रही होंगी और उस समय तक छोटी छोटी चीज़ो का इतना ज्ञान आ गया था कि किसी को परेशान करेंगे तो भगवान कि नज़र में वो गलत ही होगा। उस समय क्रिकेट खेलने में मुझे बहुत मज़ा आती थी। एक मैदान जहाँ से मैंने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की वो मेरे घर के पास में था। और रोजाना शाम को अपने दोस्तों के साथ स्कूल से आने के बाद उस मैदान पर क्रिकेट खेलने जाया करता था।
पर कुछ ही दिन उस मैदान पर क्रिकेट खेल पाए उसके बाद उस मैदान को उस समय की सरकार ने अपने अधीन कर लिया। तब हम लोग सोचने लगे की अब कहा जाये क्रिकेट खेलने क्युकि अब तक आदत हो गयी थी और बिना खेले अब हम लोगो का समय ना बीते। फिर हम लोगो ने उस मैदान के पास ही एक छोटा सा मैदान और था उसको ढूंढ़ लिया। ये मैदान उस मैदान से काफ़ी छोटा था पर एक दो दिन की दिक्क्तों के बाद फिर से इस मैदान पर भी खेलने में अच्छा लगने लगा।
वो मैदान के बाहर काफ़ी ऊँची दिवार थी जिसे फांद के खेलने जाना पड़ता था। एक दिन मेरे दोस्तों में सिर्फ एक दोस्त रमेश और मैं उस मैदान को देखने के लिए आये। दिवार फांदी हम लोगो ने जैसे तैसे उसके बाद मै और मेरा दोस्त रमेश इधर उधर घूमने लगे उस मैदान में। तभी थोड़ी देर बाद रमेश को तीन अंडे दिखायी देते है और वो हमें बुलाने लगता है और कहता है कि ये देखो सांप के अंडे। फिर मै पूछता हु कि तुम्हे कैसे पता कि ये सांप का अंडा है तो रमेश कहता है कि मै जानता हु कि ये सांप का ही अंडा है और कल को इसमें से सांप निकलेंगे और ये इसी मैदान पर रहेंगे तो हम लोगो के लिए खेलने में दिक्कत हो जाएगी।
फिर मैंने पूछा कि अब क्या करें तो वो कहता है कि फोड़ देते है इसको। तब उसकी बातों से मैं भी डर गया कि सच मे सांप आ गए तब तो हमारे लिए खतरा है तो मैंने भी कह दिया फोड़ दो इसको। तब उसने उस पर एक ईंट फेक कर सारे अंडे फोड़ देता है और खुश हो जाता है पर मेरे मन मे कुछ अजीब सा होने लगा और गहरे सोच में पड़ गया घर आने के बाद।
एक दिन पूरा यही सोचता रहा कि हम लोगो ने कितना गलत किया। मैंने अंडे को फोडा नहीं पर मैंने उसको फोडने के लिए हाँ बोला उसके लिए पछतावा होने लगा कि उस जान को लेकर क्या फायदा जिसने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा ना हो। उन अंडो में जो जीव था उसने तो अभी दुनिया भी नहीं देखी थी पर इंसान कि ये सोच होती है कि भविष्य में उसको कोई नुकसान ना पंहुचा दें इसीलिए उसको अभी खत्म कर दें। और ब्राह्मण परिवार से होने के कारण पाप पुण्य का सोचने भी लगा। मैं खुद को दोष देता रहा बहुत दिन तक पर मेरे दोस्त को उसका जरा सा फर्क नहीं पड़ा उस चीज का। जब मैंने उससे पूछा कि तुम्हे कुछ फर्क क्यों नहीं पड़ा इतना गलत किया था हम लोगो ने उस दिन तो रमेश कहता है कि भाई आगे बढ़ो कब तक उसे लेकर बैठे रहोगे जो होना था हो गया अब उसको सही तो नहीं कर सकते हो ना। आगे रमेश कहता है कि तुम्हे इतना ही बुरा लग रहा है तो उसे सीख लेकर आगे उस गलती को नहीं करंगे ये सोच लो बस। उसकी ये बात मुझे बहुत अच्छी लगी तब मैंने सोचा कि इंसान है और गलती तो करेगा ही तो उस गलती से कितना सीख ये मायने रखता है ना कि उस गलती को लेकर बैठे रहना।
मेरी उम्र उस समय बारह साल रही होंगी और उस समय तक छोटी छोटी चीज़ो का इतना ज्ञान आ गया था कि किसी को परेशान करेंगे तो भगवान कि नज़र में वो गलत ही होगा। उस समय क्रिकेट खेलने में मुझे बहुत मज़ा आती थी। एक मैदान जहाँ से मैंने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की वो मेरे घर के पास में था। और रोजाना शाम को अपने दोस्तों के साथ स्कूल से आने के बाद उस मैदान पर क्रिकेट खेलने जाया करता था।
पर कुछ ही दिन उस मैदान पर क्रिकेट खेल पाए उसके बाद उस मैदान को उस समय की सरकार ने अपने अधीन कर लिया। तब हम लोग सोचने लगे की अब कहा जाये क्रिकेट खेलने क्युकि अब तक आदत हो गयी थी और बिना खेले अब हम लोगो का समय ना बीते। फिर हम लोगो ने उस मैदान के पास ही एक छोटा सा मैदान और था उसको ढूंढ़ लिया। ये मैदान उस मैदान से काफ़ी छोटा था पर एक दो दिन की दिक्क्तों के बाद फिर से इस मैदान पर भी खेलने में अच्छा लगने लगा।
वो मैदान के बाहर काफ़ी ऊँची दिवार थी जिसे फांद के खेलने जाना पड़ता था। एक दिन मेरे दोस्तों में सिर्फ एक दोस्त रमेश और मैं उस मैदान को देखने के लिए आये। दिवार फांदी हम लोगो ने जैसे तैसे उसके बाद मै और मेरा दोस्त रमेश इधर उधर घूमने लगे उस मैदान में। तभी थोड़ी देर बाद रमेश को तीन अंडे दिखायी देते है और वो हमें बुलाने लगता है और कहता है कि ये देखो सांप के अंडे। फिर मै पूछता हु कि तुम्हे कैसे पता कि ये सांप का अंडा है तो रमेश कहता है कि मै जानता हु कि ये सांप का ही अंडा है और कल को इसमें से सांप निकलेंगे और ये इसी मैदान पर रहेंगे तो हम लोगो के लिए खेलने में दिक्कत हो जाएगी।
फिर मैंने पूछा कि अब क्या करें तो वो कहता है कि फोड़ देते है इसको। तब उसकी बातों से मैं भी डर गया कि सच मे सांप आ गए तब तो हमारे लिए खतरा है तो मैंने भी कह दिया फोड़ दो इसको। तब उसने उस पर एक ईंट फेक कर सारे अंडे फोड़ देता है और खुश हो जाता है पर मेरे मन मे कुछ अजीब सा होने लगा और गहरे सोच में पड़ गया घर आने के बाद।
एक दिन पूरा यही सोचता रहा कि हम लोगो ने कितना गलत किया। मैंने अंडे को फोडा नहीं पर मैंने उसको फोडने के लिए हाँ बोला उसके लिए पछतावा होने लगा कि उस जान को लेकर क्या फायदा जिसने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा ना हो। उन अंडो में जो जीव था उसने तो अभी दुनिया भी नहीं देखी थी पर इंसान कि ये सोच होती है कि भविष्य में उसको कोई नुकसान ना पंहुचा दें इसीलिए उसको अभी खत्म कर दें। और ब्राह्मण परिवार से होने के कारण पाप पुण्य का सोचने भी लगा। मैं खुद को दोष देता रहा बहुत दिन तक पर मेरे दोस्त को उसका जरा सा फर्क नहीं पड़ा उस चीज का। जब मैंने उससे पूछा कि तुम्हे कुछ फर्क क्यों नहीं पड़ा इतना गलत किया था हम लोगो ने उस दिन तो रमेश कहता है कि भाई आगे बढ़ो कब तक उसे लेकर बैठे रहोगे जो होना था हो गया अब उसको सही तो नहीं कर सकते हो ना। आगे रमेश कहता है कि तुम्हे इतना ही बुरा लग रहा है तो उसे सीख लेकर आगे उस गलती को नहीं करंगे ये सोच लो बस। उसकी ये बात मुझे बहुत अच्छी लगी तब मैंने सोचा कि इंसान है और गलती तो करेगा ही तो उस गलती से कितना सीख ये मायने रखता है ना कि उस गलती को लेकर बैठे रहना।




simple..but..really...sweet story
ReplyDelete❤️
Thanks Awesome AB
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